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शुक्रवार, 19 जून 2026

अदृश्य सभ्यता?!

“अदृश्य सभ्यता” 🏫 बीसलपुर का वह समय (जुलाई 1990 ई. के आसपास) जुलाई की उमस भरी दोपहर थी। अशोक, जो अब राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बीसलपुर में स्नातक का छात्र था, धीरे-धीरे बदल रहा था। उसकी आँखों में सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि सवाल थे— ऐसे सवाल जो किताबों से नहीं, भीतर के शून्य से निकलते हैं। 🛒 सुनील की दुकान – चर्चा जो साधारण नहीं थी रामलीला मार्ग पर स्थित सुनील संवेदी की छोटी-सी दुकान— जहाँ चाय, बीड़ी और बहसें बराबर चलती थीं। उस दिन विषय था — एलियन्स।
अशोक ने धीमे लेकिन ठोस स्वर में कहा: “मैं मानता हूँ कि एलियन्स हैं… लेकिन वे हमें दिखते नहीं, क्योंकि वे छिपे हुए हैं।” “क्यों छिपे हुए?” किसी ने पूछा। अशोक मुस्कुराया— “जैसे एक सच्चा आदमी समाज में छिपकर जीता है… वैसे ही।” सभी चुप हो गए। 🧠 सोच का तूफ़ान अशोक ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और लिखना शुरू किया— “सच्चाई कभी भीड़ में नहीं रहती… उसे हमेशा अकेले रहना पड़ता है…” वह सोचने लगा— क्या एलियन्स वास्तव में कोई दूसरी दुनिया के जीव हैं? या वे वही लोग हैं जो इस दुनिया में फिट नहीं बैठते? उसके विचार गहराते गए— “जब सत्ता नहीं थी, व्यापार नहीं था, तब मनुष्य सरल था। लेकिन अब… सच्चे को जीने नहीं दिया जाता।” उसे लगा— एलियन्स कोई अंतरिक्ष के जीव नहीं, बल्कि धरती पर जन्मे असली इंसान हैं— जो इस व्यवस्था से मेल नहीं खाते। 🌳 ध्यान के स्थान – जहाँ रहस्य खुलता है अशोक अक्सर इन जगहों पर जाता: रामलीला मैदान के पीछे गुलेश्वर नाथ मंदिर पीपल के पेड़ के नीचे अमरा कासिमपुर मार्ग का एकांत स्थान बाबा कालसे महाराज की शांति भूमि वहाँ वह सिर्फ बैठता नहीं था… वह सुनता था। एक दिन ध्यान में उसे एक आवाज़ सुनाई दी— “हम एलियन्स हैं… लेकिन हम कहीं और नहीं… तुम्हारे बीच ही हैं…” अशोक चौंका नहीं… जैसे वह पहले से जानता हो। 👁️ सच का खुलासा आवाज़ फिर आई— “हम वो हैं जिन्हें तुम पागल कहते हो, जिनको समाज अपनाता नहीं, जिनकी बातों को दबा दिया जाता है…” अशोक की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे समझ आ गया— 👉 एलियन्स कोई और नहीं… 👉 वह खुद भी उनमें से एक है। ⚖️ समाज और सच्चाई अब उसकी सोच और स्पष्ट हो चुकी थी— जो सच्चा है, वह अकेला है जो गहरा सोचता है, वह अलग है और जो अलग है… वही “एलियन” है उसने डायरी में अंतिम पंक्ति लिखी— “शायद एक दिन… यह दुनिया एलियन्स को समझेगी… या फिर… सब एलियन बन जाएंगे।” और.... मकान पर आकर वह लिखने लगा था कि... ऐसा नहीं है कि एलियन्स नहीं हैं?हैं लेकिन हम भी उनके लिए एलियन्स हैं क्योंकि उनके लिए यह दूसरी धरती है. अशोक अब "राजकीय स्नात्तकोत्तर महाविद्याल, बीसलपुर "में स्नातक का छात्र था. जुलाई 1900ई के लगभग। वह एक दिन मित्र सुनील संवेदी की दुकान पर था और कुछ लोगों के साथ एलियन्स की चर्चा में था. वह बोला मैं तो विश्वस्त हूं कि एलियन्स हैं लेकिन वे हम सबकी नजरों से छिपे हुए हैं. "क्यों, ऐसा क्यों?!" "ऐसे ही समझो कि परिवार,वार्ड, गांव व नगर में जैसे सहज व्यक्ति का जीना मुश्किल होता है." फिर अशोक डायरी निकाल कुछ लिखने लगा. "समझा नहीं!" "ऐसे कि जैसे सीधे साधे, विचारवान, किताबों के ज्ञान में सर्च करने वाले, सोचने वाले को शांति से अपना काम करना पड़ता है. हर व्यक्ति व समाज उसके साथ नहीं खड़ा होता?!" फिर अशोक सोचने लगा.... "जब तक दुनिया में सत्ता व राजनीति का प्रभाव न था, विश्व व्यापार का प्रभाव न था तब तक ठीक था लेकिन अब तो सच्चे को जीना ही मुश्किल है? किसी को सूली, किसी को जहर, किसी को झूठी बदनामी... और किसी का जीवन ही सजा हो जाये लेकिन उनके मरने के बाद उनके परिजन v समाज के लोग उन के तस्बीर को ताख में रख धंधा करने लगें?!" उसके मित्र सुनील संवेदी की दुकान रामलीला मार्ग पर बीसलपुर के मोहल्ला दुर्गा प्रसाद में थी. जहां पड़ोस में जनता इंटर कालेज! उसके फील्ड में सुबह या शाम अशोक पहुंच आँख बंद कर बैठता था. कभी कभी वह रामलीला मैदान में स्थित गुलेश्वर नाथ बाबा मंदिर के पीछे पीपल के वृक्ष नीचे आँख बंद कर बैठता था. जहाँ उत्तर अमरा क़ासिम पुर जाने वाले मार्ग पर एक दिव्य स्थान पर भी जाता था. काफी आगे उत्तर बाबा कालसे महाराज वह वहाँ भी जाया करता था. इन स्थानों पर वह आँख बंद कर ही नहीं बैठता था वरन लेखन कार्य भी करता था. अब वह साइंस स्टूडेंट्स से आर्ट स्टूडेंट्स ग्रुप में था लेकिन उसकी रूचि साइंस में कम न थी और वह भी एक अहसास, चिंतन के साथ प्रकृति, साहित्य, अध्यात्म सदेशों के साथ, ध्यान पद्धतियों में रूचि के साथ।